सोमवार, 16 अक्तूबर 2017


ऑफ व्हाइट   
                      उस ऑफ व्हाईट शाल को उठाकर सीने से लगा लिया है मैंने . मुझे  वह   मिल गयी है जो उस दिन धू धू कर के जल  गई थी जिसके साथ मेरा मन और मेरा वजूद भी जल गए थे.आज मेरी पगलाई गति को विराम मिला है .मेरी आँखों से अविरल आंसूं बह रहे हैं .          पहली बार ही तो गयी थी उसके घर. उससे एक बहनापा है जो बढ़ता ही जा रहा है.उसने कहा "तुम्हारा ही घर है लेकर खा लोखाना टेबल पर लगा  है।"  दिल्ली जैसे बड़े शहर में उसका पांच कमरों का  सुन्दर सजा -धजा घर है . घुसते ही उसने घर देखने  का निमंत्रण दे दिया था सो उसके घर की  बालकनी  की दसवीं मंजिल से पूरे शहर की जगमगाती झलकती  रौशनियों को झाँकने का सुख  पहले ही ले लिया था और तभी यह बात अवचेतन में उभरी थी- कि  झिलमिलाती रौशनी के पीछे बड़े बड़े शहरों में रोती- बिलबिलातीझींकतींझुग्गियां भी होतीं हैं. वे अदेखीअदृश्य सी रहतीं हैं, त्वचा के नीचे बिछी नीली-नीली नसों  की तरह।
         मैंने खाना खा लिया था क्योंकि मुझे शहर के एक छोर से उसके दूसरे छोर पर, जहाँ नरोत्तम का घर थालौटना था। दूरियां मन की हों या शहर की, मुझे सहन  नहीं होतीं मगर यह बात केवल मैं ही जानती हूँ . वोदका के केवल एक पेग ने मन को बहुत रिलैक्स कर दिया था और मैं उन तमाम भयों को भूल गई थी. उसे भी मालूम था कि नरोत्तम के आने के  पहले मुझे घर में होना है। 
 " चलोजल्दी निकलो" कहते हुए  जाने कितनी ऊष्मा से मुझे  अपनी  एक बांह  से घेर लिया था उसने  और मुझे समेटे  हुए ही बाहर तक आयी थी 
         लिफ्ट तक आते आते  मौजूदा समय  के कुछ पलों में  उससे जाने कितने कल्प की बातें हो गयीं थीं । बाहों में घेरे हुए ही उसने सुर्ख गुलाबी रंग का एक पैकेट मेरे हाथों में यह कहते हुए रख  दिया था -"ये रख लोआज  पहली बार घर आई हो। इसे हिमाचल से लायी थी मैं।"  
ये क्या ! इतना प्यार !! क्या यह उस जनम का  कोई रिश्ता है।बोलो ! "मेरी आवाज़ उसी बहनापे से छलकी थी जिसकी तलाश में मैं घूँट घूँट तल्ख़ हुई  जिंदगी के लिए भटकती रही थी ।मेरे लिफ्ट में जाते-जाते उसने  कहा था -" जिसे समझना है वह मुझे  नहीं समझता न।"  
       मैं उसके ग़मों से वाकिफ थी .उसके मृगनयन छलछला गए थे. लिफ्ट बंद होती उसके पहले मैंने उसकी बढ़ियाई आँखें देख  ली थीं । मैं तड़पकर बोल पडी थी "हंसो " बस इतना ही कह सकने का समय मिला था क्योंकि बेजान  लिफ्ट एक झटके में बंद हो गयी थी। मैं नीचे आ गयी थी. मेरा  ड्राइवर गाड़ी लेकर मौजूद  था और मैं घर जल्दी पहुँच  जाने की बेकरार बेचैनी में सब  बिसर गयी थी. तभी उसके दिए पैकेट पर उसके हाथों की गरमाई महसूस  हुई थी और जब आत्मीय उत्सुकता से उसमें झांका  तब अचंभित रह गई थी .किस तरह मिल जातीं  हैं खोयी हुई चीजें . 
       उस ऑफ़ व्हाईट शाल को छूतेनिहारतेआँखों में भरते, अचानक कनिका बेसाख्ता याद आ गई . यूनिवर्सिटी में गर्मी की छुट्टियां शुरू होने के बाद जब  चारों ओर का चहचहाता शोर सिमट कर चला जाता तब हॉस्टल में दूर तक  एक सन्नाटा पसर जाता . हवा के साथ  हरे पत्तों के बहने  की महक  नदी बहने की आवाज़ सी सुनाई देती और इक्का दुक्क्का लड़कियों की खनकती  हंसी मेरे भीतर के भयावह सन्नाटे को अकस्मात तोड़ती, अक्सर तभी मैं यूं  ही हॉस्टल के भीतरी गेट के  बाहर बने पुराने, कुछ उखड सी गई ईंटों वाले, चबूतरे पर बैठकर पत्तों को उनके अलग अलग रंगों में देखती. 
             हरे पत्तों के बीच एकाध सूखे पत्तों पर आँख ठहर जाती और मन उदास होने लगता.मुझे पापा का  वह नौकरों चाकरों और ऐशो आराम की हर सुविधा से भरा, भारी भरकम बंगला बेसाख्ता  याद आने लगता जहाँ चाहकर भी मैं, जो एक अदने से किरदार में थी, नहीं जा सकती थी. 
      मैं घने दरख्तों को बहुत हसरत से देखती.  तभी पलाश   फूल सी चटक कनिका कुछ  कहती हंसती चली आती . उसकी रंग बिरंगी छींटदार  सलवार और कुरते पर फिसलता छींटदार  दुपट्टा जिसको संभालती, वह एक पल भी स्थिर न रहती . उसके साथ यूँ ही टहलते मैं यूनिवर्सिटी की इमारत से लगे पेड़ों  के झुण्ड तक चली जाती जहाँ बनिस्बत कुछ बड़ी घास जब पावों में उलझ  रास्ता रोकने लगती तब उमस भरी  गरम शाम  का एहसास होता . कनिका बातों के झुरमुटों से निकलने  ही न देती लेकिन  एक दिन   कनिका ने कहा  "दीमैं पहली बार आपको देख के डर गयी थी।" स्याह सी हो गई मैं, हरे पत्तों से नज़रें हटा उसे देखने लगी थी .... 
  घने विषाद को परे हटा कर मैं हँस दी थी क्यों?" 
क्योंकि तब आप मुझे बहुत रहस्यमयी लगतीं थीं।"
कनिका इतना सीधा और साफ़ साफ़ बोलती  कि उसकी बातों पर जवाब देना कठिन होता था, तब सिर्फ मुस्करा देना ही मेरा जवाब होता था . मैं कैसे एक ही वाक्य में उसे अपने  तमाम दुःख बता सकती थी जिन्होंने मुझे गुमसुम और गहरा  बना दिया था कि रहस्यों से तो रोज़ मेरा साबका उसी तरह पड़ता है जिस तरह दिन का साबका रात से पड़ता है. यह मेरे साथ आँखें खोलते ही होने लगा था. फिर भी मैंने फिर पूछा था – “क्यों ? 
'क्योंकि  आप इतना मोटा चश्मा लगातीं हैं। आप इतनी दुबली-पतली, कमसिन सी हैं और आपकी आंखों के घेरे इतने काले और गहरे हैं। आपके चश्में का पावर इतना अधिक है कि उनके पीछे आपकी आँखें बड़ी बड़ी हो जातीं हैं इस तरह कि आप की अपनी आँखें नहीं दिखाई देतीं. मैं कनिका के मन को सहेज लेती थी .जानती थी  कि मेरी आँखों में समंदर से भी  बड़ा खारापन ठहरा हुआ है जिसकी व्याख्या ऐसी ही हो सकती है  .
     मै कनिका के सामने खुलती चली गई थी. वह उत्सुक थी मुझे जानने के लिए  उसी तरह,  जिस  तरह मैं बचपन में  मम्मी को जानने के लिए होती थी ।  मैं बचपन में  अक्सर  मम्मी की सिसकियों से जागती थी लेकिन जब उनकी ओर आँखें फैलाकर देखती तो उन्हें अपनी ओर बाँहें फैलाए मुस्कुराते पाती.तब सपने और हकीकत के बीच का सच मुझे क्या मालूम था .मगर धीरे धीरे मैं जान गई थी-'तुम रो रही थी न .मैं मां से पूछती और माँ  हंस पड़ती थीं . मैं भी उनके आंसुओं को चखने लगी थी .
                    पापा ने मुझे इलाहाबाद के महिला कालेज  के गर्ल्स हॉस्टल में रख दिया था। मैं माँ को छोड़कर आना नहीं चाहती थी. मुझे याद  आता कि माँ से कितनी बहस की थी मैंनेलेकिन माँ ने समझाया था कि मेरी ज़िंदगी ही उनकी जिंदगी है. वहां मेरे जीवन पर तमाम खतरे थे. माँ शायद जानती थी और मैं कुछ न जानती थी . दीदी  और मेरे  जीजू यानी जी डी  जो अचानक मेरे बड़े होने से डरने लगे थे, मुझसे उनके रिश्ते बदलते जा रहे थे. मैं उनके दुश्मनों की सूची  में सबसे ऊपर थी. मुझपर कोई निशाना वे चूकना नहीं चाहते थे लेकिन मेरी उम्र मेरे खाते में थी शायद इसीलिए वे चूक जाते थे। 
     अरबपति पापा के जाने के  बाद अरबों की संपत्ति  दो हिस्सों में  बंटे, जी डी इसकी कल्पना भी नहीं करना चाहते थे और इसलिए वे मुझे अपने रास्ते से हटा देना चाहते थे. पापा को इस बात की खबर उनके ड्राइवर  ने उन्हें दी थी . कुछ और नहीं पर शायद  पिता होने  के नाते वे मेरी जान बचाना चाहते थे आखिर मैं उनका अंश तो थी ही।यदि मैं उनका अंश न होती तब भी क्या वे मेरी कोई परवाह करते यह सवाल मेरे मन में अक्सर जब उठ खडा होता तब मैं बहुत अधिक बेचैन हो उठती थी, कितना ज़रुरी होता है जीने के लिए पिता की चाहत का  होना जो सामाजिक हैसियत से पहचान  कराता है और आदमी की हैसियत उसके जीने के लिए पानी की एक बूँद की तरह  ही ज़रूरी  होती है .
 जब मैं साँसों की जद्दोजहद में थी तब कनिका ने एक दिन निहायत मासूमियत  से  पूछा था - 
 " दीआपके पास तो बहुत पैसा है, आपके पास भी कोई दुःख हो सकता है क्या।'' कनिका के सवाल धवल चांदनी में दिखाई देती चीजों की तरह साफ़ थे. कनिका क्या जाने कि ये पैसा ही है जो मेरी  जान पर बन आया है और जिससे मुझे  नफ़रत सी होती जा रही है ।मेरे लिए तो मेरी छोटी छोटी चाहते मायने रखती हैं .मेरी पढ़ने की मेज़,  मेरी किताबें मेरे फूलदार स्कर्ट्स और  माँ की हंसी.लेकिन कुछ भी मेरा अपना  नहीं  हो पाता . मैं एक क्षण  भी  चैन से  जी नहीं पाती . मेरा अपराध क्या है. सिर्फ इतना कि मैं उस अपार संपत्ति  की  हिस्सेदार हूँ . मेरी घुटन बढ़ जाती और  मेरी आँखों के चारों  ओर के काले घेरे तभी और स्याह  हो उठते। मुझे पानी के भीतर सांसों के  उखड़ने का एहसास होता ..
कनिका यह पैसा  एक दिन मेरी हत्या  करा देगा और तुम यह खबर अखबार में पढ़ोगी। जी डी और मेरी बहन ने दो बार मुझपर जानलेवा हमले कराये हैं।" 
कनिका चौंक के उठ बैठती-"क्या कहतीं हैं दी। आपकी अपनी सगी बहन भी ऐसा कैसे कर सकतीं हैआपको मालूम नहीं होगा, वे सौतेली होंगी।" 
                     कनिका बहुत भोली थी। मेरे सामने तो जीवित बचे रहने की चुनौती थी.मरना चाहता ही कौन था . मैं तो  किसी भी कीमत पर  नहीं. कनिका बी ए करने के बाद ससुराल जाने की तय्यारी में थी. मेरी बातों की भयावहता उसे थोड़ी देर के लिए डराती या शायद वह जानबूझकर अपने सपनों के बीच वापस लौट जाती .वह चद्दरों और तकियों  पर  फूल काढ़ती थी. क्रोशिये का धागा अंगुली में फंसाए इस ब्लाक से उस ब्लाक अल्हड हवा सी घूमती रहती और मैं उसे देख कुछ देर के लिए अपने गम भुला देती .
                 मैं गर्ल्स हॉस्टल के न्यू  ब्लॉक में रहती थी और न्यू ब्लॉक की लड़कियां  हास्टल के रजिस्टर पर रात दस बजे  के  आखिरी सिग्नेचर के बाद सिगरेट के छल्ले बनाने में गुम हो जातीं थीं तो  कुछ अफसरों के बिस्तर गर्म करने और अपनी  रातें  सजाने   चौकीदार की मुठ्ठी  गरम कर  चली जातीं थी. भोर होने तक,  वे सब टूटती देह लिए निचुड़ी हुई, अपने कौमार्य को कैश कराकर लौट आतीं थीं । सुबह मेस में चाय के समय या दोपहर के खाने के समय  मिलने पर कांतिहीन दिखाई देने की वजह पूछने पर शेक्सपियर के किसी नाटक के रात में हुए मंचन को देखकर आने जैसा शानदार सा  क्लासिक कारण बता देतीं थीं लेकिन उनके नए नए कपडे और उनके कमरों के बड़े बड़े शीशेमहंगे कॉस्मेटिक्स  असली बात की खबर सबको दे देते थे। 
   ऐसे में न्यू  ब्लॉक में रहने वाली,छोटा स्कर्ट पहनने वाली मैंमोटे लेंस का  चश्मा  पहने ,काले  घेरों  से घिरी  बड़ी बड़ी आँखों वाली, लड़की यदि कनिका को रहस्यमयी  लगती थी  तो इसमें अचम्भा क्या था भला । मुझे जानने से पहले कनिका मेरे नाम की  गुमनामी को खोजती, कहीं मैं भी किसी दर्पण में दरीचो की तलाश में काले घेरों से घिर तो नहीं गई हूँ . जिंदगी की तलाश तो मुझे भी थी, मगर घुप्प अंधेरों में दीवारों के पीछे छिपकर खड़े रह जाने के अलावा मेरी कोई राह नहीं थी . 
      कलकत्ते में पापा का टेक्सटाइल्स का बहुत  बड़ा बिज़नेस था,  बनारस और कानपुर में भी। पापा पंद्रह दिन कलकत्ते रहते तब मम्मी  मेरे पास चली आतीं थीं और मेरे कमरे में मेरी मेहमान बनकर टिक जातीं थीं । हम सब बनारस में ही थे। पापा  अरबपति थे। इतनी संपत्ति की वारिस उनकी सिर्फ दो बेटियां थीं। मैं, उनकी छोटी बेटी जाने किस मुहूर्त में जन्मी थी कि मेरे दिल में जन्मने के साथ ही दहशतों का राज हो गया  था .इसके अलावा की जगह  में  मेरी  कामनाएँ और  इच्छाएं छटपटाती थीं और किसी के लिए कोई जगह न छूटी थी .
         गर्ल्स हॉस्टल की छत पर कनिका के साथ बैठकर मैं शायद प्रलाप करती रहती थी .हाँ वह प्रलाप  ही  तो  था . कनिका मुझे ताकती रहती. ठंढी हवा  में अचानक उमस  भर जाती  थी। खुले आसमान को भूल जाते थे हम . मैं तब कनिका का  हाथ पकड़ लेती थी कभी कभी ..कनिका मेरी कौन थी . सुदूर किसी कसबे से आयी एक भोली भाली लड़की. मैं नहीं जानती थी उसके बारे में कुछ भी, सिवाय इसके कि वह कनिका थी, मेरी जूनियर सहेली . कभी कभी मैं उसे इसी नाम से बुलाती, वह  हंस पड़ती थी तब मैं भी उसके साथ हंस पड़ती .. मैंने कनिका को   मम्मी के बारे सब कुछ बता दिया था .  मुझे उदास देख कनिका धीरे से कहती .. चलो दीदी, चल के चाट खिलाओ..मैं हंस पड़ती  हम दोनों बाज़ार  की ओर निकल जाते . मुझे इन्हीं छोटी छोटी खुशियों की तलाश होने लगी थी जहाँ मेरा वजूद खोया-खोया ही सही ,आधा अधूरा  ही सही, मुझे मिलता तो था . 
      मेरी चाची  जादूगरनी थी और मेरे पापाचाची के प्यार में पागल थे। मझोले कद-काठी के बदसूरत  चाचाआधे पागल होकर  उनके कारोबार में एक नौकर की तरह थे। चाची के जोड़ के तो पापा ही थे न । एक सुदर्शन शलाका पुरुष ।कहते हैं कि जोड़ियाँ आसमान से बनकर आतीं हैं . चाची और चाचा की, माँ और पापा की ये कैसी जोडी थी .जोड़ियां आसमान से बनकर आतीं तो स्त्री-पुरुष के देहमन के  सम्बन्ध इतने अधूरे क्यों होते! मुझे रिश्तों से नफ़रत होती जा रही थी . 
     अक्सर पापा कलकत्ते से लौटकर  शाम को आंगन में  पानी गिरवाकर उसे ठंढा कराते  थे। आंगन जब खूब भीग जाता तब दोनों   ओर से हनहनाते हुए चलते थे दो पेडस्टल फैन तब बाध की चारपाई पर दरी बिछती,उसपर  झक्क सफ़ेद चादर् और वहीँ पर  एक शीशम की काली-काली  गोल मेज़ लगती थी  जिसपर पापा की महंगी, प्रिय शराब शिवास रीगल की बोतल,सोडा,  एक पैकेट सिगरेट और उनका हीरे से जड़ा महँगा लाइटर होता और उसी के सामने उनकी आराम कुर्सी लगती  । दो नौकर शाम को इसी काम के  लिए मुस्तैद हो जाते। पापा घर के बाहर बने  लॉन में  भी बैठ सकते थे लेकिन तब चाची बाहर उनके साथ नहीं बैठ पातीं न। मैं अपने कमरे की खिड़की के पीछे से परदा हटाकर झांकती तब माँ वहीँ मेरे पास बैठी चुपचाप रोया करतीं ..कभी कभी वे बुत की तरह हो जातीं . मैं उन्हें जाकर हिला देती "मां" .
      झक्क सफ़ेद चादर पर चाची बैठती थीं. वे पापा को शराब के  पेग बनाकर देतीं जातीं थीं। झरने जैसी आवाज़ लिए  सांवली लम्बीकटीली और मायावी  चाची का सावला रंग माँ के जीवन पर ग्रहण की तरह था .ऐसा ग्रहण जिसे उनके जीते जी उतरना नहीं था .पापा ताकतवर  पुरुष जो  थे.   
       तभी मेरी मुलाक़ात भी एक ताकतवर  पुरुष से हो गई थी .यूनिवर्सिटी में चुनाव जीतकर अध्यक्ष बन गया था वह और मेरी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया था उसने .. अपने भी साए से डरने वाली मैं उसके सुदर्शन चेहरे में फिर अपनी मृत्यु की तलाश करने लगी थी.मैं तो उसके सामने कुछ भी  नहीं थी . वह कामदेव था लेकिन मै तो अप्सरा नहीं थी .फिर उसका मुझपर यह रीझना मेरी समझ से परे था .मुझे कहाँ से खोज लिया था उसने, उसके भाषण सुनने वालियों और उस पर मर मिटने वाली खूबसूरत बालाओं की कोई कमी यूनिवर्सिटी के उस प्रांगण में नहीं थी.वह साक्षात कृष्ण था . गोपिकाओं से घिरा हुआ .मैं कहाँ थी वहां . मैं उसके द्वारा भेजे गए प्रेम प्रस्तावों को पढ़कर कांपने लगती थी.कई कई दिन मेस से अपने कमरे और कमरे में  से मेस के बीच छुपी होती थी . भीगे पंखों के नीचे खुद  को  ढापे हुए लेकिन वह तो पापा के पास मेरे विवाह का प्रस्ताव लेकर पहुँच गया था तब मुझे पता चला था कि उसकी दिलचस्पी .. मुझमें नहीं पापा की संपत्ति में थी . 
         पापा ने ख़ुशी खुशी मुझे  उससे ब्याह दिया था बिना ये  पूछे -जाने कि मुझे वह पसंद  है  या नहीं .मैं एक मुहरा थी जिसे पापा और नरोत्तम दोनों अपने ढंग से चल रहे थे .पापा जी डी  को  मात  देने  के  लिए और नरोत्तम मुझे और पापा दोनों को  मात देने के लिए .हार और जीत का खेल जारी था  . 
      नरोत्तम विधानसभा का चुनाव लड़कर जीत गया था और सरकार के गठन में मुख्य भूमिका निभा रहा था . पापा एक बाहुबली के  हाथों में मुझे सौंपकर  मुक्त हो गये थे .पापा पक्के व्यवसायी थे .. पापा चाहते थे कि उनकी संपत्ति की आधी हिस्सेदार मैं जीवित रहूँ आखिर मैं उनके पौरुष की  निशानी  थी लेकिन मैं भी तो खेल ही रही थी . विवाह के बाद जीवित बच जाने का सुकून मेरे चेहरे पर उतर आया था .  
      प्रेम के बारे  में तो मैं सोच भी नहीं सकती थी मुझे नरोत्तम के बारे में सब कुछ पहले से मालूम था.लगभग तभी यह भी  मालूम हुआ था कि  पापा ने चाची की इस मांग को ठुकरा दिया था कि कलकत्ते वाली कोठी वे उनके बेटे असीम के नाम कर दें .मैं प्रेम नाम के देवता के प्रति और भी निष्ठुर हो चुकी थी .
      ब्याह के पहले मैं कनिका से मिली थी .उसका पता भी ब्याह के बाद  बदल गया था जिनपर पत्रों का सिलसिला बना रहा था . ग्रीटिंग कार्ड्स और कभी कभी टेलीफोन से कनिका सम्पर्क बना ही लेती थी .
         मैं जीवन से  विरक्त  हो रही थी फिर भी जीने  की चाह पाले हुए थी  .. मैंने तो अपनी गर्दन पर चाकू की नुकीली सर्द धार को हर दिन और  रात महसूस किया था और भागते दिन और जागती रातें बितायीं थीं. वे रातें  ही मेरी आँखों के चारों ओर स्याह घेरे के रूप में जमा हो गयीं थीं             उफ़्फ़  कितने सहरा  हैं और कितने बंजर। मुझसे यदि बाहुबली नरोत्तम ने ब्याह न किया होता तो मैं क्या जी डी से बच गयी  होती और अपनी ज़िंदगी के असहनीय ताप भरे दिन भी देख सकी होती । यह जानते हुए भी कि   नरोत्तम ने मुझसे कहाँ  ब्याह  किया उसने तो अरबपति की बेटी से ब्याह किया और  मैंने जीने के लिये समझौता किया। मुझे जी डी से बचने के लिए नरोत्तम की ढाल चाहिए थी। आज वह सरकार में महत्वपूर्ण विभाग के  कैबिनेट मंत्री हैं और मैं अपनी आँखों के चारों ओर बढ़ते घेरों के बीच ज़िंदा हूँ। 
            जीने के लिए क्या-क्या नहीं किया है मैंने। कुछ छोटे छोटे काम  नहीं  भी  कर पाई हूँ.  रात भर कभी सोयी नहीं हूँ । नरोत्तम को रोज़  रात ऐश करने का साधन चाहिए यह मुझे मालूम है पर पूजा की बेदी पर उनके साथ बैठने का सौभाग्य तो सिर्फ मेरा ही है। यह भी जीने के लिए कुछ कम वजह नहीं लगती मुझे . 
          मुझे जीना है इसके लिए मैं जाने कितने एक्सक्यूज़ गढ लेती हूँ यह भी मुझे मालूम है । मुझे मालूम है कि मैं कोई भी चक्रव्यूह  नहीं तोड़ सकती।  मैं पहला द्वार ही न तोड़ सकी. सांतवे द्वार तक कहाँ पहुँचूंगी।ओहदे  और पैसे की ताक़त देखी है मैंने  और  उससे अपने लिए आज़ादी भी  हासिल की है ।
            विद्रोह मेरे भीतर केंचुए की तरह रेंगता है।वह रेंगना भी कम तो नहीं. मुझे गुमनामी की आदत है। मैंने नरोत्तम से कह दिया है कि मुझे अपने ढंग से घूमने फिरने दो। तुम्हें जो करना है करो।  मेरी बेचैनियां  मुझे भटकाती हैं. मैं धुंओं को नकारती शुद्ध  हवा खोजती हूँ. मुझे भटकने की इजाज़त दे दो।  नरोत्तम ने इसकी इजाजत मुझे दे रखी है . भटकाव  अक्सर मुझे छोटी  छोटी  ठाँवों तक ले  जाकर छोड़ आते हैं जहाँ से मुझे इतनी साँसे मिल जातीं  हैं कि कुछ पल मैं  बेफिक्री में  जी लूं . 
           क्या उसे  मालूम है  कि बचपन की  उस एक शाम से आज के एक एक दिन  तक  मैं इसे तलाश रही हूँ..आज ही जान पाई कि   किसी खोयी चीज की तलाश  ताउम्र किस तरह  भटकाती   है ।  जाने कितनी चीजें छूटतीं हैं और जाने कितनी बेचैनियां आत्मा के अस्तित्व में हमेशा हमेशा के लिए समा जाती हैं। तभी यह ख़याल आया था कि  ये पूरी की पूरी  क़ायनात   यूँ ही तो  नहीं भटक रही है इसे भी किसी चीज़ की  तलाश त है  । लेकिन यह भी तो सवाल है कि क्या  खोया हुआ सच में  मिल जाता है या जिसकी चाहत शिद्दत से करते रहें हम उससे मिलाने में पूरी कायनात जुट  जाती है . तुम्हारे स्नेह की बाती का यह सुरमई उजाला  है यह शाल मेरे खोये हुए  बचपनका वजूद  है. तुम्हें नहीं मालूम कि तुमने मुझे क्या दे दिया है। प्यार करने वाले यूँ ही अनजाने मेंं  जाने क्या क्या दे दिया करते  हैं  .सड़क का  कुहासा अचानक छोटी छोटी झाड़ियों में दुबक गया  है .कहीं  वह  कुहासा मैं  ही  तो नहीं  हूँ .कभी कभी दिखती हूँ मगर अक्सर खो जाती हूँ।    
             रात के एक बज चुके थे। हरियाणा  के  अनजानखौफनाकखाप-पंचायती सन्नाटे वाली सडकों पर  जान जोखिम में  डाले टहलती  रहती हूँ मैं।मुझे जीजू से और पुरुषोत्तम  से डर लगता है मौत से नहीं, मैं चाहती हूँ मैं खुद खो जाऊं लेकिन मेरे भीतर धड़कता  दिल  सपने पालता रहे ..मैं बड़ी  नहीं छोटी छोटी  ख्वाहिशों  के  लिए  ज़िंदा  हूँ तभी तो अपनों की छुअन भर के लिए  जान  हथेली पर रख लेती हूँ । रात के सन्नाटे में अबतक  लगभग एक किलोमीटर के दायरे तक एक मेरी ही कार तो  है।  चमचमाती हुई इस कार पर यह तो  लिखा  नहीं है कि मैं किसी बाहुबली की बीबी हूँ। इस भयावह सन्नाटे में अगर कोई अचानक आकर गाड़ी रोक ले तो मैं क्या कर लूंगी या यह अदना सा ड्राइवर ही, मगर  हत्या तो  क्या मैं तो बलात्कार की दुर्दमता से भी ऊपर उठ चुकी हूँ.
           उनकी बात याद आ रही थी "इतनी बहादुरी दिखाना ठीक नहीं है, अब दुबारा यह  जोखिम न उठाना" उन्हें क्या  मालूम नहीं, कि मैं तो जोखिमों  के बीच ही ज़िंदा  हूँ. वे कहते नहीं हैं फैसला सुनाते हैं. उनका  इतना अधिकार और अपनापन  ही जीने के लिए  बहुत सी  ताक़त देता है। वे सिर्फ मित्र नहीं हैं। उनसे जन्मों  पुराना मेरा नाता है। एक ही मन में सूरज की रोशनी से रिश्ते  और अंधेरी खाई से रिश्ते पूरी शिद्दत से एक साथ मेरे भीतर ज़िंदा हैं शायद इसे ही ज़िन्दगी कहते हैं और इसे ही जीना .यह अलग बात है कि उनसे कभी कभी ही मुलाक़ात हुई है फिर भी वे मन के साथ रहते हैं.           
         मेरी आँखों के आगे फिर वही सब घूम गया है जिसे मैंने हज़ारहा अपने मन में  दुहराया है.मन में छुपा बैठा कोई एक दर्द किस तरह हरा होने लगता है. आज इस हिमाचली शाल को छूते ही महसूस कर रही हूँ .
       माँ  के मन सी उदास वह शाम,वही आँगनवह बाध की चारपाई और उस पर रखा हुआ यही हिमाचली ऑफ़ व्हाइट शॉल।यह या वह। मैं सचमुच असमंजस में हूँ। टिमटिमाते तारों सा मेरा  बचपन आँगन  के  उस अँधेरे में अंतिम उम्मीद की  तरह मेरी  स्मृतियों पर  टिमटिमाता है   उसी तरह जिस तरह पापा की जलती हुई सिगरेट आँगन  के अँधेरे में आज भी धधकती है और जिसकी धधक मेरे सीने में जलती है। 
       मुझे  चाची की आँखें पापा की सुलगती हुई  सिगरेट सी  लगतीं थींमुझे  समझ में नहीं आता  था कि ऐसी आँखों को लोग किस तरह मदमातीनशीली और मदभरी आँखें कहते हैं।  लोग यही तो कहते थे कि पापा उनकी आँखों के गुलाम हो गए हैं कि उनकी आँखें किसी को भी गुलाम बना सकतीं हैं । चाची के हमारे घर आने से बहुत पहले पापा  ऐसे नहीं थे। उनको देखने के बाद वे पूरी तरह बदल गए. यह बात जब मम्मी  कहती तो उनकी आवाज़ मुझे  सत्रहवीं  सदी के  किसी उपेक्षित कुएं से आती हुई महसूस होती।  
                       
                         उस दिन पापा पानी से भिगोये  ठंढे ठंढे आँगन में चाची के साथ  बैठे हुए थे।  पापा शिमला से लौटे थे।  चाची के लिए लाये कई उपहारों के बीच एक जालीदार ऑफ़ व्हाइट शाल रखी हुई थी।  मम्मी की चुप सी  सिसकियों को महसूसती हुई मैं जाने किस आवेश में भरकर   दूर से ही  शाल को देख रही थी और उसका जालीदार होना मुझे मुग्ध कर रहा था या  कि   वह मम्मी  की मौन सिसकियों का विद्रोह था। कुछ भी रहा हो लेकिन यह तो तय था कि उसका जालीदार होना मुझे  बुरी तरह से मुग्ध कर रहा था। 
             मैं  एक क्षण भी रुके बिना आँगन में पापा के पास पहुँच गयी और जोर से बोल पडी थी -  पापाअअ  ! पापा चौंक पड़े थे उनके आँगन में बैठकर  शराब पीने के दौरान किसी को भी  वहां पहुँचने की इजाज़त नहीं थी। "पापा ! ये शाल बहुत सुन्दर है इसे मैं लूंगी।"मैंने शाल उठा ली थी .  चाची ने आँखों में आग भरकर मुझे इस तरह देखा था  जैसे मुझे भस्म  ही कर देंगी। पापा ने कहा- "यह शैली के लिए है यह उसे बहुत पसंद  है ।  तुम्हारे लिए दूसरी आ जायेगी।"

    " चाची के लिए दूसरी आ जाएगी, यह मुझे पसंद आ गयी है।"मैं  भी उसी ताब में बोली थी ।   उस दिन मुझपर किसी निरपराध कैदी  की आत्मा  का भूत सवार था। 
"नहींई ई " पापा का "नहीं" देर तक उस आँगन में  गूंजता रहा था लेकिन मेरा नहीं भी उसी समय गूंज उठा था  . मम्मी कातर होकर मुझे दूर से आवाज़ दे रहीं थीं। लेकिन मैंने कुछ न सुना था। मेरी निगाह उस शाल से  हटनी ही नहीं थी। मैं कल इसे अपने साथ लेकर इलाहाबाद जाउंगी और मैंने लपककर शाल उठा ली थी। चाची की आँखों के अंगारे दहक उठे थे।  मेरे  और चाची के बीच उस शाल को लेकर छीना झपटी होने लगी थी।
                'मेरी  नहीं तो किसी की नहीं' यह कहते हुए  चाची ने मेरे गाल पर एक झापड़ मारा था और शाल मुझसे छीन ली थी !  मैं फिर शाल की ओर झपटी थी और तब तक चाची ने पापा के लाइटर से उसमें आग लगा दी थी। पापा चुपचाप बैठे रहे थे और वह जालीदार हिमाचली शाल धू-धू कर उसी आँगन में जल गया था। किसी  ने उसे बुझाने की  न हिम्मत न कोशिश ही की थी। वह अपनी ही आंच में भस्म हो गया था।  
                उसकी चिंदियाँ  भी धुँयें  में लिपट कर उड़ गयी थी. सखीआज वही समूचा शाल तुम्हारे दिए इस पैकेट के  भीतर उसी तरह महफूज़ था जिस तरह उसे ओढ़ने की  मेरी चाहत मेरे दिल में आज तक महफूज़ थी।  
       मैं घर पहुँच गयी हूँ। रात के ढाई बज गए हैं, नरोत्तम अभी घर नहीं लौटे हैं। बेडरूम में  पहुंचकर एसी ऑन कर मैंने चादर ओढ़ ली है . सदियों की जागी मैं उस ऑफ व्हाइट  शाल को ओढ़कर उम्र भर की नींद पूरी करने की ख्वाहिश लिए सोना चाहती हूँ लेकिन सो नहीं पाती.एक हल्का सा खटका भी मुझे उनींदा कर के जगा दे रहा है .
      नरोत्तम के डगमगाते पैर और दहकती आँखें,चाची की आँखों सी दिखाई दे रहीं हैं,वर्षों से सुलगती पापा की जलती सिगरेट फिर से धधक रही है. मेरी आँखों में उसी धुएं की जलन भर रही है. उस आँगन का पानी आजतक सूखा नहीं है.जाने कब सुबह होने हो जाए. मैं बेचैन हूँ .धीरे से उठकर अपने सीने पर पड़ी उस शाल को सहलाती हूँ,तह लगाती हूँ और अगली सुबह की फ्लाईट से माँ के पास जाने की तय्यारी में जुट जा रही हूँ . एअरपोर्ट से ही मैंने क
निका को फ़ोन कर दिया है ,वह जो मेरे दुखों की संगिनी रही थी उससे उसके ही शहर आकर कैसे न मिलती फिर उससे अपना  सुख भी बांटना था .मैं उत्फुल्ल थी .
        अपने शोल्डर बैग में उस शाल को संभालती मैं माँ के सामने खडी हूँ . माँ बूढ़ी हो गई हैं. उनकी आँखों की रोशनी धुंधली है "मां" वे मेरी आवाज़ पहले पहचान लेतीं हैं फिर देखती हैं  'बेबो, तू अचानक कैसे आ गई.'मैं माँ से लिपट जाती हूँ ..मां ये  देखो ...मैं शाल उठाकर उनके हाथों में रख देती हूँ. मेरी आँखों की चमक उनकी आँखों में प्रतिबिंबित हो रही है. उनकी आँखें हंस रहीं हैं लेकिन तभी वे झरने लगतीं हैं. उनके दुःखों  की शिलाएं टूट रहीं हैं . वे बारिश और धूप  दोनों हैं . माँ आँगन में उसी जगह बैठी हैं जिस जगह पापा बैठते थे. आसमान में आज चाँद पूरा उगा है .
प्रज्ञा पाण्डेय 
९५३२९६९७९७ 
          




          




बुधवार, 21 जून 2017

  चाँद की एक अंतहीन  रात        
        
नारायण  उस दिन सीने में सिर गाड़े हुए अम्मा के पास से निकले तो सधुआइन के डेरे पर  जाकर ही रुके और तीन रात और दो दिन वहीँ पड़े रहे . अम्मा ने कई बार सन्देश  भिजवाया तो आये लेकिन ड्योढी के भीतर नहीं गए, बैठक से सटे कमरे में रुके और ताजिंदगी अपने ही घर का आँगन   देखने की कसम खा गए  .उस आँगन में  इकौनावाली जो रहती थी .सधुयाइन  को सर्वस्व देकर वे तो   हमेशा के लिए  बदनाम हो  गये लेकिन इकौना वाली ! उसे तो घर की  दीवारों ने उसे कोई  अधिकार भी नहीं दिया .हुआ वही जो होना था , उधर नारायण ने सारे बंधन तोड़ दिए इधर इकौना वाली ससुराल की दीवारों में चुन दी   गई   .
                    
देह की आग कोई संस्कार तो  जानती नहीं  है तभी तो जब जवानी अपने शिखर पर थी और लाख रोकने पर भी इकौना वाली के  अवचेतन पर हावी थी तब रात चूल्हा समेटते हुए  उसकी गदराई देह बेकाबू हो  जाती  थी वह चूल्हे की राख के नीचे की  चिगारियां कुरेदती पहर पहर  भर सोती थी , कभी कभी सारी रात वह  सींक लेकर  राख पर  नारायण का चित्र उकेरती थी  .बसंत के मौसम सा  बदन लिए  उठती तो थोड़ी देर के लिए   इतना  उजास छाया रहता कि आसमान का  चाँद भी उसे ही निहारता था उसकी बड़ी सी  गोल बिंदी का   दिप दिप , सौन्दर्य का आभा मंडल रचने के लिए काफी था  .केश बांधने के बाद मांग भरने के अतिरिक्त इकौनावाली को  किसी और  श्रृंगार की जरूरत ही कहाँ थी फिर भी  वह तो सिर्फ नारायण के लिए जनम भर जागती रही .
                                    
वह   तेरह   की  थी जब  उसकी भाँवर  पड़  गयी थी और उसके  ढाई साल बाद ही  गौना हो गया था  जब वह ठीक साढ़े  पंद्रह की थी .तब वह कच्ची सी  अमिया   थी जब  बाबू  साहेब लोगों की  ऊंची ड्योढी  लांघ  कर उसने वह क़ैद संभाली थी  . सवा महीने चौका चूल्हा  छूना  था . अम्मा की  भारी  भरकम काया  और वैसी ही बुलंद आवाज़ सुनकर पहले दिन तो वह डर ही  गयी थी और घूंघट के भीतर से अम्मा को कांपती हुई देखती रही थी .  सपाट  बिना बिंदी का माथा और धूपिल हुई घास के जैसे  बिखरे बाल, खुरदुरा सांवला गहरे दागों वाला चेहरा और कोंचती सी  देखती हुई  आँखें . दिनभर में  ऐसा कौन  होता जो  खाना खाने के बाद अम्मा की  गाली भी   खाए बिना  घर से बाहर जाता . मर्दों की तरह हरहर गरियाती थीं अम्मा . उसको अपनी डरपोक अम्मा याद आतीं थी काका को देखते ही  आँचल नाक से नीचे तक खींच लेने वाली  .
                      
ससुराल पहुँचने पर  दिनभर गाँव की औरतें उसका मुंह देखने आतीं  रहीं थीं . टहकती गर्मी में भी कढाईदार  लाल रेशमी साड़ी  से ढंके  उसके  चेहरे को एक दूसरी  स्त्री आकर  भौहों से लेकर  ठुड्डी तक भर खोलकर चेहरा दिखा कर फिर मूँद देती थी। इस बीच वह अपनी आँखें बंद रखती  थी, उसे कौन देख रहा है यह  उसे  नहीं देखना था किसी को   पहचानने  की ज़रुरत ही थी, जो कोई भी  उसका चेहरा मूंदता या खोलता था वह उसे  पहचान पाती  थी तो सिर्फ  आवाज़ से . हर आधे घंटे पर  कोठरी से  उसके लिए  बुलावा  जाता था . अम्मा की चारपायी  के पास एक छोटा सा  पीढ़ा रखा होता .   घूंघट के  ऊपर से वह लाल रंग का एक और गोटेदार दुशाला ओढ़ती थी तब अपनी कोठारी से बाहर निकलती थी और गठरी  बन उसी पीढ़े पर बैठ जाती . लम्बे घूंघट के कारण  चलते समय  साड़ी कई बार उसके  पांवों में फँसती, उसे लगता कि  वह गिर जायेगी लेकिन कोई कोई उसे दोनों बाहों  में  घेरे   रहता . वह जो गिरती तो मान सम्मान तो उनका ही जाता। घूंघट के अन्दर ही अन्दर वह यह सोच कर हंस भी लेती .जिसे भी  अम्मा बतातीं-" सास लगेंगी गोड़ धरो"   वह  उसके दोनों  पाँव अपनी नन्हीं  हथेलियों  से दबा दबाकर छूती और लस्त  पस्त  उठकर अम्मा के पाँव भी छूती . दिन भर में   अम्मा के पाँव  वह कम से कम बीस बार तो  छूती ही  थी . यह रिवाज उसकी माँ  ने उसे खूब ठीक से समझाया  था। लेकिन एक बार वह अम्मा का पाँव छूना भूल गयी तो अम्मा ने दस औरतों के बीच उसे खूब सुनाया भी .'नए ज़माने की हैं भाई काहे धरेंगी  'वह सकपकाई हुई उठी और अम्मा के पाँव छूते मन ही मन अपने नील कंठी देव को याद भी किया 'रच्छा करना  हे भोले बाबा ' उसे क्या मालूम था कि कोई आएगा उसकी रक्षा  करने .
                                         
ससुराल में पहली रात तो वह फुआ के पास सोयी  लेकिन अगले ही दिन  शाम की पूजा होने के बाद  कक्कन छूटने की  रात फुआ उसको दूसरी कोठरी में ले गयीं और फुसफुसाकर उसके कान में  बोलीं 'केवाड़ी   ओठंगाकर  कर सोना,भीतर से   बंद करना '. वह कुछ समझती तब तक वे चली गयीं .अनसमझा अनचीन्हा   भय  उसको कंपकपा जाता  .  नारायण से पहली बार मुलाक़ात होनी थी वह भी रात के अँधेरे में . धड़ धड़  करते दिल को वह जोर जोर से दबाती कहीं उछल कर बाहर गिर पड़े  उसेउसी दिन  मालूम हुआ  कि  दिल कहाँ होता  है . होता है यह तो वह बरसों से जानती थी  .
                  
उसकी गोल-गोल  कलाईयों पर दर्जन भर   चूड़ियाँ उसकी तरह ही दिनभर कसमसाती थी . दोपहर चढ़े   जब सब लोग  ओठंगते तब  अपनी  आँगन के दूसरी ओर बनी, नीम-ठंढी धुंधले अँधेरे की   कोठरी  में पहुंचते ही सिर का आँचल हटा देती  थी इकौना वाली . आने के दूसरे तीसरे दिन से ही उसका  नाम रख दिया गया था  इकौना वाली .   कोठरी में पाँव रखते ही  मदहोश  कर देने वाली  नशीली  महक उसके नथुनों में भर जाती और दिन का नीम  अँधेरा  रात के अँधेरे से गुत्थमगुत्था होने लगता  .
                         
गुलाब का इत्र   और साथ ही  आंवले के तेल की गहरी  महक कोठरी में उसके पाँव रखते ही  उसे अपने आलिंगन में बाँध लेते थे  जैसे उसके नारायण हों .उसके  नारायण  धोती कुरता  पहने कब आते और कब चले जाते थे यह उन नीम बेहोशी के पलों का स्वप्न  लगता था उसे  जिसपर  यकीन करने की कोशिश वह उन्हीं पलों में  नहाती हुई करती रहती थी पर देखे हुए स्वप्न सा वह बार बार फिसलता जाता वह दुबारा उसे स्वप्न और सच  के बीच खोजती लेकिन वह  उसको मदमाती किसी  गंध  सा रात दिन नारायण के  नशे में  धुत्त रखता था . रात  की बात यादकर अकेले में अपना चेहरा अपनी हथेलियों में छुपा लेती . चैतन्य हो  पाती कि  दूसरी नशीली रात  जाती  .  अलस पलकों पर कई रातों की नींद का डेरा उठाये दिन में  उसके पाँव ठिकाने  पड़ते। नारायण पूरी रात जगाकर   उसे देह का सोमरस पिलाते थे  कच्ची उम्र में लड़कियों को बहुत  नींद आती है यह अक्सर  सुनती आई   थी  अब  उसके भोले -भाले चेहरे पर एक तिर्यक  मुस्कान किसी रहस्य सी चली आती . दिन भर होंठ सूखते थे और   पूरी देह  नारायण की दी हुई छापों को याद करके सिहरती थीदिन में जब घर के सब मर्द   खाना खाने आते थे तब उसे लगता  कि  एक नज़र  है जो उसकी ओर  देख रही है . एकाध बार मन की  डोर छोड़कर वह भी घूंघट के भीतर से उस रात वाले को खोजती थी  कभी  वह कई   के बीच में दिखता था तो   कभी उसे बहुत  धोखा भी होता था जो उसे  बिना देखे निकल गया वह नारायण नहीं रहे होंगे तब साडी  के भीतर ही भीतर किसी अनजाने अपराध बोध में लाज से  कछुए सी हाथ पाँव सिकोड़ने  लगती .   
                                          
इकौना वाली  घूंघट में छिपी छिपी   नैहर के  आम की बगिया ,करौंदे, हाते  का हैण्ड पम्प , याद करती  और लचीली  डालों को जमीन तक  घसीटते बड़े-बड़े कटहल  के घार   इस तरह याद आते कि  कभी कभी उसका  घूंघट फेंककर सरयू के विस्तार में  फैले बलुअट  तट  तक  दौड़ आने का  मन हो आता  लेकिन अब तो वह कई बंधनों में बंधी   थी .भारी दोपहर में सरयू में नहाने वाली वह  मुंह अँधेरे  ही आँगन में लगे हैण्डपम्प  पर  नहा लेती थी   .अम्मा कहतीं औरत का नहाना और मर्द का खाना कोई नहीं देखता है   .तभी तो समझदारी का काम करती कि नारायण को किरण फूटने के पहले ही जगाकर कोठरी के बाहर कर देती थीनारायण के जाने के बाद  वह मायके से आई अपनी नयी नयी पलंग पर सोती नहीं थी उसे अम्मा से बहुत  डर लगता था  ..किसी दिन जो आँख लग जाए तो अम्मा कुण्डी पीट डालती थीं .
                  
नहाने के बाद सोलहो सिंगार कर पांवों की एडियों पर  आलता लगाकर सींक से फुल्कारे बनवा कर वह अपने पावों को   निहारकर  खूब खुश होती ,और दिनभर उन्हें  पानी से बचाती रहती थी . इसके लिए अम्मा की  ख़ास सेविका कलावती  सवा महीने रोज सबेरे आएगी और  बाद में दूधो नहाओ पूतों फलो का आशीर्वाद देकर  अच्छा -सच्चा नेग ले जाएगी . खूब सबने तो असीसा उसे  अम्मा ने भी लेकिन अम्मा की असीस में हरदम  रुखाई थी . विवाह के पहले जिन पावों पर कभी उसकी नज़र भी न  पड़ी थी उन्हीं पावों पर  पानी पड़ने पर  जब लाल लाल आलता पसरता तब अपने पावों की वह नरम मुलायम  अंगुलियाँ मंत्र मुग्ध होकर  देखती  रहती और सब भूल जाती .आलता ज़रा भी मद्धिम पड़ता  तो फुआ  बड़े प्यार से बोली बोल देतीं '
'
और भी कोई काम करना है क्या   तुमको "
 
आईने में खुद को ही  देखती तो डर जाती थी वह . सिन्दूर और काली घुंघराली लटें पसीने में बहकर उसके चेहरे पर इस तरह एकाकार होते थे  जैसे सूरज की किरण और रात  के दो तीन पहर साथ साथ   हो।  अपना ही  चेहरा पहचानकर घबरा उठती . चौंक कर वह सोच जाती   यह किसका रूप है शीशे में .वह तो ऐसी नहीं थी फिर अकेले ही हंस पड़ती इकौनवाली .
                      
                           
गौना होने के छह महीना बाद वह   रजस्वला हुई और सोलह साल की  उम्र में पूरी स्त्री बन गयी . घर की चाहरदीवारी की कैद में कभी कभी जी इतना घबराता कि   टुकुर टुकुर बस आँगन में उगते चाँद को वह देखती रह जाती .उड़ कर वहीँ चले जाने का मन होता तब नारायण कौंध जाते थे .बेरहम और रहम वाला जो एक साथ  है उसका चित चुराने वाला, उसके दिल को लूट लेने वालाकौन है वह  !  उसकी नरम देह को गूंथ देने वाले  नारायण  दो घड़ी में उसे अपने भीतर उतार लेते थे और उसके कान में फुसफुसाते थे "तुम कच्ची शराब हो ' दिन के उजाले में वह  नारायण का चेहरा देखने को तरस जाती . सबके सो जाने पर नारायण  दबे पाँव आते थे। अम्मा और फुआ आँगन में ही सोती  थीं थोड़ी ही देर बाद ताख पर रखी  ढिबरी भी बुझ  जाती नारायण उसके बुझ जाने  का इन्जार करते  . खुले  आँगन  में उतान सोने वाली अब किसी के  इन्तजार में  किवाड़ उढ़का कर बैठी रहती  है.नारायण की आहट पाते ही दरवाज़ा खोल देती .
              
लाज से लाल होकर वह  समर्पण की पीड़ा  से भर  कराहने को होती कि  एक बलिष्ठ हथेली  उसका मुंह दबा देती  "एक फुसफुसाती नशीली आवाज़ उठती मेरी रानी कुछ बोलो .और एक शब्द बोले बिना  वह  ऐसे निढाल हो जाती जैसे घुमावों को छोड़कर  भीगी हुई रस्सी हो.तीन पहर रात उसकी कोठरी में बिता कर  उसका चाहने वाला चकोर उजाला होने से पहले  चला जाता नदी के दूसरे तट पर  .नारायण हर रात किसी  चोर की तरह आते और उसका तन मन  चुरा ले जाते .  उसे उन का आना अच्छा  लगता था उन की निर्दयता उन की लूट अच्छी लगती  उनका  बेशुमार प्यार अच्छा  लगता था जिसे  उसने  पहली बार चखा था .  प्यार के अतिरिक्त वह और क्या खोजती थी कि नारायण को पाने की  उसकी चाहत बढ़ती ही जाती थी वह सोचती  .उसपर हरदम अम्मा का ग्रहण लगा रहता था .उस छाया में वह घुटने लगी थी ..
             
सुबह शाम के होने की तरह उसके  नयेपन को मलिन करने वाली   बातें साथ साथ चल रहीं   हैं . लेकिन उसे क्या मालूम था कि अम्मा की नज़र उसके घोसले पर है वही जिसे  वह और नारायण बड़े मन से सजाने में लगे थे   .   रात में जब  नारायण के आने का समय होता और वह इंतज़ार में बैठी होती थी  तब वह   अनकती थी।  उसे अम्मा का बार बार करवट बदलना  फुआ को बुलाने लगना कभी पानी  कभी पान मांगना शुरू होना परेशान करता था . नारायण रुक  जाते थेवह नारायण की बाट  जोहती कभी  बैठे बैठे सो भी जाती थी .अचेतन मन क्या जाने डर . जाने कब अम्मा सो जातीं और जाने  कब नारायण उसे अपनी गोद में  उठाकर जगा  लेते थे .सुबह अम्मा उसे ऐसे देखतीं जैसे रात  में उसने कोई अपराध कर दिया हो  .उससे इतने अटपटे सवाल उसे शर्म से भर देते थे .
"
ये तुम्हारी आँख  क्यों लाल लाल हुई  हैं? रातभर सोती नहीं हो क्या ?"वह अम्मा का भावहीन चेहरा देख कर   जातीजाने किस अज्ञात दुर्भाग्य  का  उत्सव मना रही है  वह . वह  कुछ चीन्हने में लगी थी लेकिन समझ पाती थी .
     
नारायण  जो  उसे अँधेरे  में चूम डालते थे  ,अब तो दिन में भी भवरें सा मंडराने लगे  थे . वह अपने को खूब सजाती थी नारायण को सजना पसंद था . जब मेहमान जाने लगे थे और घर खाली होने लगा था तब वह भी कुछ हिलने डूलने लायक हुई थी। लाज के बंधन कुछ नरम तो पड़े थे . एकदिन जब नारायण  उसे नहीं देख रहे  थे  तब इकौना वाली  उन्हें गौर से निहार रही थी उस रात वाले प्रेमी  को पहचान रही थी . उनका सांवला   चेहरा  बहुत आकर्षक था कटीली  नुकीली मूंछें थीं  . वह निहाल  थी . अक्सर तो यही होता था कि  अम्मा से कुछ माँगने के बहाने वे घर में चले  आते  थे और उसको टकटकी लगा कर देखते  थे वे अम्मा का डर भी भूल जाते थे तब सिर झुका लेना उसकी मजबूरी हो जाती थी  . मर्द की आँख में आँख डालकर थोड़े ही देखेगी .इन सब बातों के लिए तो अम्मा  बचपन से ही समझात़ी रहीं हैं . जब वह पलट कर जाने लगते  तब उसकी आँखें नारायण की पीठ पर चिपकी रह जातीं थी और उसी समय वह पलटते  थे  और उन का देखना पल भर में  उसकी देह पर इस तरह फैल जाता   कि पोर पोर में भरकर छलकती हुई उसकी  देह साक्षात बढ़ियाई   सरयू हो जाती थी    .
              
क्या करेगी बाग़ बगीचा घूमकर अमिया , करौंदा खाकर . उसके मर्द  से बढ़कर थोड़े है टपकता  महुआ ही  इमली की खटमीठ , ही सरयू का छल छल पानी . अब तो सांझ होते ही वह अपने आलते की शीशी निकाल लाती है और पावों को आलते से रंग  देती है . चोटी गूंथ कर मांग दुबारा भरती है काजल लगाकर भर होंठ हंसती है. लेकिन जाने क्यों अम्मा से डरती  है .जब  वह तैयार होकर  लाल लाल एडियों  से पायल छन छन् करती चौके की ओर जाती  तब अम्मा उसे घूर घूर कर देखतीं हैं . अम्मा विधवा हैं . उसे मालूम है . उनकी चौड़ी सफ़ेद  मांग  जेठ में तपती रेती है .वह उस रेती को ध्यान से निहारती है और उसके पाँव जलने लगते हैं   जब कभी अम्मा के सिर पर तेल रखती है तब अम्मा जोर से उसका हाथ झटक देतीं हैं . 'हट क्या  चूड़ियाँ छनका रही है ?जा किसी और को दिखा !मुझे चिढाती है ?"
घबरा जाती है  इकौना वाली  . सत्रह साल की उम्र में विधवा हो गयीं थी वे नारायण ने बताया था .अम्मा का   टहटह सिन्दूर पानी डालकर धो दिया गया . चूड़ियाँ टूट गयीं थीं और तभी  नारायण अम्मा के पेट में अङ्खुआ  रहे  थे . आँगन बुहारते समय भी ब्लाउज़  के अन्दर से शीशा  निकालकर अपना चेहरा निहारने वाली शौकीन  अम्मा  को पाला  मार गया था  फुआ से  सुना . अपने सुखों को अम्मा ने लोहे के भारी संदूक में भरकर ता ला मार दिया था और बक्से को अतीत के गहरे पानी में उतार कर हमेशा के लिए दूसरी स्त्री बन गयीं  .एक साल बाद तब चेतीं थी जब नारायण दो महीने के हो गए थे .उन्हें नारायण के लिए जीना है और उसके लिए उन्हें जायदाद की रक्षा करनी हैयह बात  उस दिन एक साथ समझ में गयी जिस दिन अम्मा की छातियों में  दूध नहीं उतरा  .
      आग और हल्दी रंग के अतिरिक्त अम्मा ने अपने जीवन में कोई और रंग कभी  देखा देखा भी तो  केवल नारायण के लिए  . अम्मा नारायण के पिता को कभी कभी खूब गालियाँ देतीं थीं .अक्सर बाहर वाले दालान में अकेली बैठी वे बडबडाती  थीं . 'दहिजरा का नाती, हरामी  अपने तो  चला गया जेहल कर गया हमको .इसका खेत खलिहान संभालने में हमारा जनम नरक हो गया ' उस समय अम्मा का चेहरा रौद्र हो जाता और वह भीतर तक दहल जाती . 
                             
नारायण  किसी भी तरह तृप्त रहें वे जी लेंगी .फुआ ने उसको  बताया 'नारायण अपनी मर्जी से  एक रोटी कम नहीं खा सकते थे .नारायण बिना चटनी के खाना नहीं खाते . नारायण के लिए लोई अम्मा ही बनातीं उससे बड़ी उससे छोटी . इस तरह नारायण का बहुत कुछ ऐसा  था जिसे अम्मा ही तय करती थीं .जब से वह आई है तब से   नारायण के लिए चटनी  बनाने की जम्मेदारी  अम्मा ने उसे दे दी थी  . नारायण  कहीं जाएँ  अम्मा के पास सुबह और शाम उन्हें आना ही था  इसीलिए किसी भी रिश्तेदारी नातेदारी से रात बिरात भी वे लौट आते थे और अम्मा के पायताने खड़े होकर कह देते थे ."अम्मा हम  गए"  तब अम्मा चैन से करवट बदल कर सो जातीं थीं लेकिन नारायण के अपने सुख भी तो थे  .अम्मा वहां तक कभी जा भी सकी क्या ! वे खूब गाना खूब दौड़ना चाहते थे .बाक़ी लड़कों की तरह  नदी में पौरना चाहते थे और लड़कों की तरह कंचा, कबड्डी खेलना चाहते थे .लेकिन अम्मा को नहीं पसंद था तो नारायण ने भी वही किया जो अम्मा को पसंद था .
              
अम्मा कहतीं  ' तुम नोहरे के हो हमारे अकेले और सबके तो चार चार हैं .. तुमको कुछ हो गया तो हम   कहाँ जायेंगे, बाबू '. नारायण के ऊपर अम्मा पूरा  का कब्जा था . अब नारायण को इस कब्जे की आदत हो गयी थी . वे अम्मा के कहने पर ही चलते थे . नदी , पोखर नहाने की इजाज़त अम्मा उन्हें देती नहीं थीं . अम्मा नारायण को खोने से डरतीं थीं   लेकिन जब से इकौना  वाली आई थी  नारायण अम्मा के कब्जे से छूट रहे थे।  पूरी तरह से खो रहे थे  . पूरे गाँव को अकेले धकेल कर किनारे करने वाली अम्मा ने शासन करने के अलावा प्रेम करना जाना सीखा था  फिर चार दिन की छोकरी की इतनी औकात कि  नारायण से आँख मिला मिला हंसती है और नारायण पर जादू  करती जा रही है . खाते समय नारायण कहते हैं . 'अम्मा दाल आज बहुत बढियां बनी है . किसने बनाई  है '.नारायण जानबूझकर उसकानाम सुनना चाहते हैं ..यह बात अम्मा कैसे बर्दाश्त कर लें .नारायण पर अम्मा का कब्जा है और अम्मा कब्जा किसी कीमत पर नहीं छोड़ सकतीं हैं .अम्मा सबको पस्त करके अपना झंडा गाड़े हुए थीं . मजाल नहीं थी कि इतने बड़े गाँव दबंगों के होते उनके खेतों की ओर किसी की निगाह चली आती . एक बार अपने ही जेठ को घूंघट के भीतर से ही गाँव भर के सामने  बोली थीं 'रौउआं   कुक्कुर हईं '. तबसे जेठ ने उनकी ओर रुख नहीं किया था . अम्मा अपने दुश्मन को इस तरह मारती थीं कि  पानी   मांगे . ऐसी अम्मा आखिर इस बात  को  कितना सहती  कि नारायण के मन में इकौना वाली इस तरह बस जाए जैसे बंगाल की जादूगरनी   कि  नारायण को भेड़ा  बनाकर बाँध लें . .
         
अब  अम्मा को इकौना वाली एक पल नहीं बर्दाश्त होती  . उसका रूप रंग उसका ढंग शऊर  उसका खाना  पीना कुछ भी नहीं . जब तब अम्मा इकौना  वाली पर चिल्लातीं हैं . अम्मा को अब नारायण भी  फूटी आंख नहीं सुहा रहे थे . बार बार नारायण को ढंग से रहने और लाज लिहाज का वास्ता देती चल रहीं थीं फिर भी नारायन दिन भर में दो तीन बार इकौना वाली को देखने के बहाने  निर्लज्ज की तरह घर में चले आते हैं एक झलक भी देख तो पाते फिर भी जी मानता  एक तो अम्मा की सख्त पहरेदारी ऊपर से इकौना वाली  का लंबा घूंघट . घर में तीन ही तो  थे   वह नारायण और अम्मा . अम्मा अब इकौना वाली को नारायण के सामने खड़ी  होने देना भी   चाहने लगीं थीं . कठिन होने लगा था अब नारायण का इकौना वाली से मिलना .एक बार अम्मा नैहर गयीं तो दमयंता  को नारायण की चौकसी में रख गयीं . दमयंता नारायण जिसे दिद्दा कहते .जिसे अम्मा ने कोख जाये सा पाला  था और ब्याह किया था .             
                     
ब्याह के पंद्रह साल बीतने के बाद भी इकौना वाली माँ नहीं बनी .इसमें उसका कोई कुसूर तो नहीं थादमयांता  पास के ही गाँव में ब्याही थीं इसलिए जब मन आये वे अम्मा का साथ निभाने और इकौना वाली को  गरियाने चली आतीं थीं . जितने दिन दमयंता  रहर्तीं थीं उतने दिन नारायण का साहस घर की चौखट के भीतर आने का  नहीं होता था .  बस खाना खाने ही आते थे और इकौना वाली से बिना कुछ बोलेबाहर  निकल जाते थे . अम्मा का दाहिना हाथ थी दमयंता . नारायण उससे यह भी नहीं कह पाते थे कि  जाओ अपना घर संभालो .अम्मा ने नारायण को ऐसे निर्णय नहीं सौंपे थे .
     
वह   ताड़ जैसी बिना छांव की दोपहर थी . अम्मा और दमयन्ता सुबह से ही इकौना वाली से चिढी बैठी थी .उस दिन आँगन में वही थी अम्मा नहा रहीं थी और दमयंता  घर से बाहर थी .नारायण ने एक लोटा पानी माँगा  था .प्रेम की एक रेखा जो धूप  की तरह आकर चली जाती थी आज  उसको उसी की छांह मिल गयी थी .इकौनावाली ने  पानी का लोटा नारायण को दे दिया . इकौनवाली के लिए आज की सुबह अनमोल थी
        
इकौना  वाली पर सवालों  की बौछार करते हुए दमयंता यही पूछ   रही थी- 'बोलो  रात में नारायण क्या चोरी से तुम्हारे पास नहीं आते  ?तब भी औलाद क्यों नहीं जनी तुमने ?
इकौनावाली  जुबान सिल कर बैठी थी यह बात दमयंता को बर्दाश्त नहीं हुई .अम्मा बोलीं -' देख दमयन्ता  इसकी देह भी ठीक है .कहीं इसमें ही तो खामी नहीं है " अम्मा और दमयंता  ने इकौनावाली  को कोठरी में ले जाकर गिरा  दिया . उसकी दोनों जाँघों फैलाकर के दमयन्ता  झाँका   '-बोली देह तो ठीक है अम्मा  " दमयन्ता फुफकारती हुई   बोली 'उट्ठ , भयवा काहे   आवेला रे  तोरे लगवा   . अम्मा बोलीं -'लड़का हमारा सीधा है लेकिन इसी के कारण  बर्बाद हो गया है नहीं तो क्या सधुआइन का नाम कोई उसके साथ जोड़ता .. कर्मुही .. कहीं की !"इकौना वाली बहुत देर तक ज़मीन पर पड़ी हुई सुबुकती रही . यह पहली बार नहीं था सास और नन्द से कई बार  मार खा चुकी है लेकिन उसके स्त्री होने पर संदेह उन लोगों ने पहली बार जताया था .              
                       
नारायण जो उसको अपने प्राणों से अधिक प्रेम करते थे अब उसकी झलक भी नहीं देख पाते हैं .अब उन्हें कुछ  मालूम भी होगा कि  क्या क्या गुज़रती है उसपर . अम्मा खुश हैं कि  बेटे पर उनका कब्जा  बरकरार हो गया है .इकौना वाली का  दिल अब नहीं  दुखता है देह . वर्षों की कोई  रीस है जो इन लोगों के मन में भरी है . दमयंता हर दूसरे महीने ससुराल से भागकर चली आतीं हैं  और छह छह महीने हिलती नहीं हैं। इकौना वाली अब तो  खुले आँगन मेंकहीं भी अंधेरी अकेली रात में भी उतान  सोती है .बेधड़क . जानती है कि  रात बिरात भी अब नारायण उसके  पास नहीं आयेंगे  .अब किस के लिए कोठरी के द्वार उढकाए अब किसके लिए वह सारी रात बैठी रहे . क्या दमयंता  और अम्मा यह नहीं जानतीं  कि  उसके माँ बन पाने में उसका कोई भी दोष नहीं है !अम्मा  जानती  हैं .
        
तोहमतें सजाने  के लिए ही तो  जन्मी  इकौना वाली ! अम्मा का उत्सवहीन  जीवन और दमयंता  का परदेसी पति इस सब की गाज कही तो गिरती ही .तब भी  इकौनावाली ने बहुत जतन  किये  दूर दूर गयी ओझा  सोखा  सब को मनाया .एक ही आस थी किसी तरह  नारायण लौट आयें उसके पास. वह हार गयी .
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अब अधिक विचार  नहीं करती .कितना सोचे .सोचते सोचते इस तरह थक गयी है जैसे कोल्हू में चलते चलते बैल थक जाता है .एक ही बात  बार बार .कुछ भी नया तो नहीं है .एक ही दुःख अपनी गहनता खो देता है . नहाकर मांग भरते समय उसकी  अँगुलियों में काठ मार जाता है . शंकर पर जल चढाते इकौना वाली यही सोचती है कि  पत्थर के  भगवान्  सुन पाते तो  कहती सुनती  . कभी जंगल सी हरी थी वह और वैसी ही महकती हुई .
        
वह कैसे भूले .नारायण उसे गूलर कहते थे। "काहे" ? वह इठला कर कहती थी तब नारायण कहते " वैसी ही तो गोल गोल हो "और अपनी मूंछों को सहलाते हुए  कातिल हंसी हंसते थे .
              
अचानक एक रात से  अम्मा खटिया डालकर उसके कोठरी के ऐन  दरवाजे पर सोने  लग गयीं .नारायण  अम्मा को वहीँ सोया देखकर चुपचाप  निकल जाते  .अब तो यह रोज़ का नियम हो गया     . खाना  हो तो अम्मा पानी दाना  लेना हो तो अम्मा .वे  आवाज़ देते थे  .दाना  और शरबत  अम्मा के हाथ में पकडाते समय इकौना वाली के पाँव बैठक की ओर जाने के लिए बेसब्र हो उठते थे लेकिन अम्मा की कोंचती  आँखें जब उसे घूरतीं  थीं तो वह  सिर झुका कर   और देह के उछाह  को  धीरे धीरे  शांत करती  थी जैसे  नदी के तट पानी को थहा देते हैं . मन  बेकाबू हो जाता  देह चौहद्दियां तोड़ने लगती
                 
इकौना वाली की देह सुलगती रही . एक बार सुदासन ने इकौना वाली का हाथ पकड़  लिया था ' मालकिन तुम्हारी यह हालत देखना मुस्किल पड़ता है हमें .. ठाकुर  को हम समझायेंगे . इकौना वाली ने अपनी जवानी  भर की ताक़त लगा दी थी सुदासन से दूर होने के लिए .शरद की चांदनी उसके हिस्से में भी होती पर उस को अँधेरे में बदल कर अपने कमरे में भाग आई थी और बहुत दिनों तक सुदासन के सामने पड़ी थी . सुदासन की बलिष्ठ देह कई बार झकझोर  डालती थी  मगर इकौनावाली  ने अपने चारों ओर  झाड उगा ली थी  . उसकी देह में नारायण ने प्रेम का जो  डेरा बनाया था वह उजड़  गया था तो कौन दूसरा उसे बसा पाता  . उसके नारायण से बढ़कर कौन था। उसकी ज़रूरतें तो  सिर्फ नारायण पूरी कर सकते थे .
       
अब तो  दो किनारे हुए नारायण और इकौनवाली। उन  के बीच कोई सेतु भी नहीं जो दोनों को जोड़ सकेगा  बल्कि   हरहराती हुई स्मृतियों की ऐसी  विप्लवकारी नदी है जो कोई  पुल बनने ही नहीं देगी और अब इस मुकाम पर आकर सेतु की ज़रुरत ही क्या है .बियाबान  तो वह अकेली पार कर आई है . यादों की जो चिरायिन घुटती गंध है .वह तो और दूर ही करती जाएगी उसे और नारायण को .अब उसकी हड्डियों को छोड़ती , झूलती चमड़ी में बचा भी क्या है .उसकी नाभि की गहराईयों का तिल  अनदेखा  ही तो रह गया  .
               
निचाट  बाँझ दिन  है कोई पानी देने वाला नहीं  बचा है नारायण को उसको  . अम्मा को पानी तो उस  ने दिया लेकिन अब उसको  कौन  तारेगा .आखिरी दिनों में   अम्मा का